भारतीय नाट्य परंपरा के अनुसार शिव आदि नर्तक हैं.
हमारे पूर्वज शिव से नृत्य का उद्भव एवं प्रसारण मानते
आये हैं.मुख्य रूप से सारे देश में शिव के चार रूपों की
पूजा की जाती है.प्रथम -विलाप'अर्थात -विनाशक के
रूप में (बंगाल)में द्वितीय -योगी के रूप में (म.प्र )में
तृतीय -वरदाता के रूप में (सर्वेत्र)पूजे जाते हैं.चतुर्थ
- नटराज के रूप में (दक्षिण )में .
शिव के यौगिक रूप की आराधना भारत के
मध्य भाग में अधिक की जाती है.बंगाल में उनके
विनाशकारी रूप की आराधना होती है. और दक्षिण
में उनकी आराधना आनंद नर्तन करने वाले नटराज
के रूप देखी जा सकती है.
वरदाता के रूप में वे सर्वेत्र पूजे जाते हैं.शिव को परि-
- पूर्ण अभिनेता के रूप में तथा श्री नंदी केश्वेर के रूप में
पूजे जाने का भी वर्णन मिलता हैं.
Wednesday, January 12, 2011
Tuesday, November 30, 2010
''साहसी लाली ''बाल कहानी
बात उस समय कि है जब लाली बहुत छोटी थी और उस समय वह अन्य बच्चों से अलग सोच रखती थी .सारे बच्चे जब पोशम्पा, नदी -पहाड़ ,और लुका-छिपी के खेल खेला करते थे,तब लाली को वो खेल उबावूलगते थे .वो हमेशा वीरता के खेल खेलना पसंद करती थी.इसके अलावा रेत में खेलना उसे बहुत भाता था.खासकर रेत में वो महल बनाया करती थी.वह सपना भी देखती तो वो महल -दुमहले का होता था.महल कोई मामूली महल न था,उसमे ऊँची-ऊँची मीनारें और गोल-गोल गुम्बज हुआ करते थे.लाली जब अपने सपने के बारेमें अपने साथियों को बताती तो वे लोग लाली की खूब खिल्ली उड़ाया करते थे.इसके अलावा लाली का दूसरा शौक था हथियार चलाना.
हथियार चलाना वो बड़ी लगन और मेहनत के साथ अपने पिता से सीख रही थी.तलवार,
बरछी,भाला,और न जाने कई शस्त्र चलाने में वह निपुण हो गई थी.एक दिन जब लाली बच्चों के साथ खेल रही थी.तो किसीके शोर का स्वर उसके कानों में पड़ा''बचाओ -बचाओ शेर आया,शेर आया'' जैसे ही लाली ने सुना बिना कुछ सोचे-समझे शेर के सामने पहुँच गई.और उसने देखा की शेर दीनू के सामने दौड़ा चला जा रहा था.दीनू को धक्का देकर लाली ने बिना कुछ सोचे-समझे शेर के सामने छलांग लगा दी.उसके साथ के बच्चे और दीनू लाली को इस अवस्था में देखकर डर से
कांप उठे और उन्होंने लाली को शेर के पास जाने से मना भी किया.लेकिन लाली कहाँ मानने वाली थी? उसने बड़ी ही चालाकी,सूझ-बुझ और निडरता के साथ शेर का मुकाबला किया और उसे घायल कर मार गिराया.उसके बाल सखागन लाली की बहादुरी देख दंग रह गए. उन्होंने चिल्ला-चिल्ला कर सभी गाव वालों को इकट्ठा कर लाली की बहादुरी के किस्से सुनाये.इस तरह गावं की भोली-भाली लेकिन निडर लाली के चर्चे गाव के बहार दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गए.और हों भी क्यूँ ना,लाली ने काम भी तो बड़ी बहादुरी का किया था.शेर को इतनी कम उम्र में मार गिरना कोई मजाक नहीं था.
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है की विपत्ति के समय निर्भीक होकर समझदारी से काम लेना चाहिए.परिस्थिति के अनुसार दूसरों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए.एक लड़की चाहे तो आत्मसुरक्षा के लिए शस्त्र चलाना सीख सकती हैऔर उसका इस्तेमाल भी कर सकती है.
ज़रूरत पड़ने पर दूसरों का और स्वयं का बचाव कर सकती है.बस आवशकता है सच्चे संकल्प की .
हथियार चलाना वो बड़ी लगन और मेहनत के साथ अपने पिता से सीख रही थी.तलवार,
बरछी,भाला,और न जाने कई शस्त्र चलाने में वह निपुण हो गई थी.एक दिन जब लाली बच्चों के साथ खेल रही थी.तो किसीके शोर का स्वर उसके कानों में पड़ा''बचाओ -बचाओ शेर आया,शेर आया'' जैसे ही लाली ने सुना बिना कुछ सोचे-समझे शेर के सामने पहुँच गई.और उसने देखा की शेर दीनू के सामने दौड़ा चला जा रहा था.दीनू को धक्का देकर लाली ने बिना कुछ सोचे-समझे शेर के सामने छलांग लगा दी.उसके साथ के बच्चे और दीनू लाली को इस अवस्था में देखकर डर से
कांप उठे और उन्होंने लाली को शेर के पास जाने से मना भी किया.लेकिन लाली कहाँ मानने वाली थी? उसने बड़ी ही चालाकी,सूझ-बुझ और निडरता के साथ शेर का मुकाबला किया और उसे घायल कर मार गिराया.उसके बाल सखागन लाली की बहादुरी देख दंग रह गए. उन्होंने चिल्ला-चिल्ला कर सभी गाव वालों को इकट्ठा कर लाली की बहादुरी के किस्से सुनाये.इस तरह गावं की भोली-भाली लेकिन निडर लाली के चर्चे गाव के बहार दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गए.और हों भी क्यूँ ना,लाली ने काम भी तो बड़ी बहादुरी का किया था.शेर को इतनी कम उम्र में मार गिरना कोई मजाक नहीं था.
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है की विपत्ति के समय निर्भीक होकर समझदारी से काम लेना चाहिए.परिस्थिति के अनुसार दूसरों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए.एक लड़की चाहे तो आत्मसुरक्षा के लिए शस्त्र चलाना सीख सकती हैऔर उसका इस्तेमाल भी कर सकती है.
ज़रूरत पड़ने पर दूसरों का और स्वयं का बचाव कर सकती है.बस आवशकता है सच्चे संकल्प की .
Wednesday, November 3, 2010
Tuesday, October 26, 2010
बिटिया
बिटिया के आगमन ने आज हर्षित कर डाला है,
बेरंग से इस जीवन को, इक सुंदर रंग में ढला है.
बिटिया के नन्हे आँखों ने,आज चमक में ढाला है
धूमिल होते सपने को, आज सच कर डाला है.
बिटिया के नन्हे क़दमों ने,राह सुगम कर डाला है
अवरुद्ध होते मार्ग को,आज सरल कर डाला है.
बिटिया के नन्हे हाथों ने, आज दुआ कर डाला है
विध्वंसक होते बापू को,आज साधू कर डाला है.
बिटिया के नन्हे मुख ने,आज ब्रम्हनाद में ढाला है
कटु होते वचनोंको,आज मिश्री कर डाला है.
बिटिया के आगमन ने,आज हर्षित कर डाला है.
बेरंग से इस जीवन को,इक सुंदर रंग में ढाला है.
बेरंग से इस जीवन को, इक सुंदर रंग में ढला है.
बिटिया के नन्हे आँखों ने,आज चमक में ढाला है
धूमिल होते सपने को, आज सच कर डाला है.
बिटिया के नन्हे क़दमों ने,राह सुगम कर डाला है
अवरुद्ध होते मार्ग को,आज सरल कर डाला है.
बिटिया के नन्हे हाथों ने, आज दुआ कर डाला है
विध्वंसक होते बापू को,आज साधू कर डाला है.
बिटिया के नन्हे मुख ने,आज ब्रम्हनाद में ढाला है
कटु होते वचनोंको,आज मिश्री कर डाला है.
बिटिया के आगमन ने,आज हर्षित कर डाला है.
बेरंग से इस जीवन को,इक सुंदर रंग में ढाला है.
Monday, October 25, 2010
ओम
मन रे तू कहे ना ओम जपे ..२
ओम जपन से..२
मन विचलित ना होय
मन रे ..२
ओम शब्द में ब्रह्म निहित है
ओम शब्द में स्वयं निहित है
ओम करे उद्धार
मन रे..२
ओम शब्द में प्रकृति निहित है
ओम शब्द में पुरुष निहित
ओम करे विश्वास
मन रे..२
ओम शब्द में भाव निहित है
ओम शब्द में भक्ति निहित है
ओम करे चमक्तकार
मन रे..२
ओम शब्द में ईश निहित है
ओम शब्द में विश्व निहित है
ओम करे निर्माण
मन रे..२
ओम शब्द में ध्यान निहित
ओम शब्द में धरम निहित है
ओम करे कल्याण
मन रे तू कहे ना ओम जपे
ओम जपन से..२
मन विचलित ना होय
मन रे ..२
ओम शब्द में ब्रह्म निहित है
ओम शब्द में स्वयं निहित है
ओम करे उद्धार
मन रे..२
ओम शब्द में प्रकृति निहित है
ओम शब्द में पुरुष निहित
ओम करे विश्वास
मन रे..२
ओम शब्द में भाव निहित है
ओम शब्द में भक्ति निहित है
ओम करे चमक्तकार
मन रे..२
ओम शब्द में ईश निहित है
ओम शब्द में विश्व निहित है
ओम करे निर्माण
मन रे..२
ओम शब्द में ध्यान निहित
ओम शब्द में धरम निहित है
ओम करे कल्याण
मन रे तू कहे ना ओम जपे
Sunday, September 26, 2010
अगर मैं घुंघरू होती माँ ?
अगर मैं घुंघरू होती माँ,छन-छन ,छन-छन करती माँ
पल-पल,पल-पल आनंद मैं भरती माँ
नाच के पेट भरती माँ,दुःख में भी मैं हंसती माँ
जब जी चाहे नचती माँ,दिल में सबके बसती माँ
तन का श्रृंगार मैं करती माँ,दरउसके जा मैं रहती माँ
घर सबके मन में करती माँ,सब लोगों को मैं हरती माँ
नट सम्राट के पग में सजती माँ,तुम देख मुझे खुद हंसती माँ
अगर मैं घुंघरू होती माँ,छन-छन,छन-छन करती माँ
पल-पल,पल-पल आनंद भरती माँ
अगर मैं घुंघरू होती माँ, अगर मैं घुंघरू होती माँ
पल-पल,पल-पल आनंद मैं भरती माँ
नाच के पेट भरती माँ,दुःख में भी मैं हंसती माँ
जब जी चाहे नचती माँ,दिल में सबके बसती माँ
तन का श्रृंगार मैं करती माँ,दरउसके जा मैं रहती माँ
घर सबके मन में करती माँ,सब लोगों को मैं हरती माँ
नट सम्राट के पग में सजती माँ,तुम देख मुझे खुद हंसती माँ
अगर मैं घुंघरू होती माँ,छन-छन,छन-छन करती माँ
पल-पल,पल-पल आनंद भरती माँ
अगर मैं घुंघरू होती माँ, अगर मैं घुंघरू होती माँ
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