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Sunday, September 12, 2010

बारिश

गर्मी से बेहाल धरा ने नतमस्तक गुहार किया
तब प्रसन्ना  हो इन्द्रदेव ने  बरखा का आगाज़ किया
छोटी बड़ी सभी बूंदों ने बिखरा दी छटा निराली
सोंधी-सोंधी खुश्बू प्यारी फिर महकी इस धरती पे
फूल पेड़ पंछी फिर चहके ऋतुराज का दिल भी बहके
मस्त पवन फिर धीरे-धीरे बरखा का आलिंगन करके
अरसे से प्यासी धरा के आँचल में बूंदों को भरके
इठलाके-बलखाके झूमकर भीगे
बच्चे ,बूढ़े सभी जन भीगे
रंग-बिरंगी छतरियों संग भीगे
कागज़ कि किश्तियों संग भीगे
तन भी भीगे- मन भी भीगे
इन्द्रधनुषी रंग में सब भीगे
बरखा के आनंद में भीगे
भीगे जन फिर जी लें
भीगे जन फिर जी लें .

4 comments:

  1. फूल पेड़ पंछी फिर चहके ऋतुराज का दिल भी बहके
    मस्त पवन फिर धीरे-धीरे बरखा का आलिंगन करके
    अरसे से प्यासी धरा के आँचल में बूंदों को भरके

    बहुत अच्छा चित्रण...बधाई

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  2. आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को |

    कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  3. Veenaji aapko rachna bhaie,main dil se aabhari hun.umeed hai aapka margdarshan aage bhi milega?

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  4. Sanjayji aapko meri kavita ruchi main aabhari hun.
    avashya main aapke blog me dastak dungi.

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