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Sunday, September 26, 2010

अगर मैं घुंघरू होती माँ ?

अगर मैं घुंघरू होती माँ,छन-छन ,छन-छन करती माँ
पल-पल,पल-पल आनंद मैं भरती माँ
नाच के पेट भरती माँ,दुःख में भी मैं हंसती माँ
जब जी चाहे नचती माँ,दिल में सबके बसती माँ
तन का श्रृंगार मैं करती माँ,दरउसके जा मैं रहती माँ
घर सबके मन में करती माँ,सब लोगों को मैं हरती माँ
नट सम्राट के पग में सजती माँ,तुम देख मुझे खुद हंसती माँ
अगर मैं घुंघरू होती माँ,छन-छन,छन-छन करती माँ
पल-पल,पल-पल आनंद भरती माँ
अगर मैं घुंघरू होती माँ, अगर मैं घुंघरू होती माँ

11 comments:

  1. सुंदर अभिव्यक्ति , बधाई

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  2. हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  3. भावपूर्ण रचना..घुंघरू से तुलना बहुत सुंदर शब्दों में..भावपूर्ण रचना के लिए आभार

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  4. भावपूर्ण रचना के लिए आभार|

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  5. जितनी तारीफ़ की जाये कम होगी। घुँघरू की कल्पना मात्र ही तन-मन में तरंग पैदा करने वाली है।सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  6. घूंघरू नहीं पर तुम्हारे आगमन से रूनझुन तो होती है
    बेटियाँ ही तो हैं जो प्रेम का बीज बोती हैं.

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  7. sunilji aapne kimti waqt nikala or meri rachna ko saraha ye aapka badappan hai.mere pas aapka shukriya ada karne ke liye alfaz km pd rahe hain.aapka margdarshan mera sambal hai.

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  8. sanjay bhaskrji aapne meri jazbaton ko samjha or saraha..dhanyawad.aage bhi margdarshit karte rahiyega.

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  9. v.k.pandeji aapne mere blog pr aakr meri kavita ko saraha main aabhari hun.

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  10. M vermaji bahut khoob kavita ka jawab kavita se,
    de kr aapne ye sabit kr diya ki aap bhi ek kushal
    lekhak hain.meri shubhechchha.

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  11. patilji aapka aabhar.anya rachanayen bhi padhiyega.

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